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जब भी कोई ख़त भेजो…

वरिष्ठ कवि बी. एल. गौड़ की कलम से

जब भी कोई खत भेजो
तो यह मत लिखना
कि तुम कैसे हो ?

अब कैसा भी होना
या रहना
कोई मायने नहीं रखता

यदि दिन प्रतिदिन
जिजीविषा दम तोड़ती हो
स्वासों की गति
कभी तेज तो कभी धीमी रहती हो
तब हम, जिंदगी को नहीं जीते
बल्कि, जिंदगी हमें जीती है
और तब किसी का यह पूछना
कि आप कैसे हैं
तो इस वाक्य के शब्द
अपना मतलब खो देते हैं ।

सूरज का उगना
लगने लगे
जैसे शाम हुई
जो भूल गई ओढ़ना
चूनर सुरमई
लगने लगे जैसे
चल रहे हैं हम भी
सूरज के साथ साथ
अस्ताचल की ओर
तब लगता है पहुंच रहे हैं हम
अपने निवास पर।

यदि कभी इत्तेफाकन
इधर से गुजरो
तो याद रखना
जफर के महल जैसा खंडहर
और अगर मिले लटका हुआ ताला
तो समझ लेना
गई है एक रूह
उस कलम को सलाम करने
जो लिखती थी अक्सर
कि तुम कैसे हो ।

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