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वैशाली को सील करने का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, दायर हुई याचिका…

Abhishek Singh

गाजियाबाद के वैशाली इलाके में कोरोना मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी के बाद प्रशासन द्वारा सेक्टर स्कीम लागू कर सीलिंग की कार्यवाई का मामला सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा है. वैशाली निवासी अधिवक्ता फ़ुजैल खान ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर की है. दायर पीआइएल में उन्होंने कोर्ट से हस्तक्षेप करने की मांग की है कि गाज़ियाबाद प्रशासन को सीलिंग की कार्यवाई को और अधिक पारदर्शी बनाने का निर्देश दें.

वैशाली निवासी अधिवक्ता फैजुल ने गाज़ियाबाद प्रशासन की कोरोना से लड़ने की तैयारियों पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि 3 जून को जिस गेटवे सोसाइटी को सील करने के आदेश पारित हुए हैं, उसमें इस बात का ज़िक्र तक नहीं किया गया है कि आखिर ये स्कीम कब तक लागू रहेगी. प्रशासन के इस आदेश के बाद वैशाली में सोसाइटी के करीब 700 लोग एक चाहरदीवारी में कैद होने को मजबूर हो गए हैं.

यह है सेक्टर स्कीम..

गाजियाबाद के जिलाधिकारी अजय शंकर पांडेय के मुताबिक़ ये सेक्टर स्कीम बहुत ही प्रभावी है जिससे कोरोना के संक्रमण को रोकने में कामयाबी मिलती है. इस स्कीम के तहत एक इलाके को जोन और सेक्टर में बांटा जाता है जिसमे मजिस्ट्रेट, डॉक्टर्स, नगर निगम की तरफ से सफाई कर्मी तैनात किये जाते हैं, ताकि किसी को कोई समस्या न हो. ऐसे इलाकों में केवल आवश्यक सेवाओं से जुड़े हुए लोगों को आने जाने की अनुमती होती है. इसका मकसद लोगों को घरों में रखकर संक्रमण को रोकना ही मुख्य मकसद होता है.

क्यों हो रहा है विरोध..

दरअसल, सेक्टर स्कीम लागू होने के बाद वैशाली में लोग/व्यापारी अपनी दुकान नही खोल पा रहे हैं, जिन लोगों को नौकरी और व्यवसाय के सिलसिले में नोएडा और दिल्ली जाना होता है वो अपने घरों में रहने को विवश हैं. इन्ही कारणों के चलते लोग वैशाली में सेक्टर स्कीम का विरोध कर रहे हैं. वकील फैजुल भी इसी का विरोध कर रहे हैं. उनका आरोप है कि जहा संक्रमण सामने आये है स्वास्थ्य विभाग वहां सैंपलिंग तक नही कर रहा ये बड़ी लापरवाही है. बस लोगो को घरों में रहने को मजबूर किया जा रहा है,

ये है याचिका में..

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि प्रशासन का सीलिंग का आदेश गैर कानूनी है और उसे जल्द हटाया जाना चाहिए. यह भी मांग की गयी है कि इंसिडेंट कमांडर के उस आदेश को खारिज कर दिया जाए जिसमे उन्होंने सीलिंग के आदेश पारित किये हैं, क्योकि ये याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकारों का हनन है.

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